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Wednesday, October 20, 2010

जो आपने  लिया होऐसा कोई इम्तहान  रहा,
इंसान आखिर मोहब्बत में इंसान  रहा,
है कोई बस्तीजहा से  उठा हो ज़नाज़ा दीवाने का,
आशिक की कुर्बत से महरूम कोई कब्रस्तान  रहा,
हाँ वो मोहब्बत ही है जो फैली हे ज़र्रे ज़र्रे में,
 हिन्दू बेदाग रहाबाकी मुस्लमान  रहा,
जिसने भी कोशिश की इस महक को नापाक करने की,
इसी दुनिया में उसका कही नामो-निशान  रहा,
जिसे मिल गयी मोहब्बत वो बादशाह बन गया,
कुछ और पाने का उसके दिल को अरमान  रहा !

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